Former Chief Minister Digvijay Singh had saved RKDF and Satyasai College in financial irregularities, in the matter of the Supreme Court

वित्तीय अनियमितता में आर.के.डी.एफ.और सत्यसाई कॉलेज को बचाया था पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मामला पंहुचा सुप्रीम कोर्ट में

   वित्तीय अनियमितता में आर.के.डी.एफ.और सत्यसाई कॉलेज को बचाया था पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मामला सुप्रीम कोर्ट में पंहुचा

राधावल्लभ शारदा। भोपाल।20/9/17 .लगता है की राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण व्यूरो के अधिकारी कही न कही आर.के.डी.एफ कॉलेज के साथ साथ सत्यसाई कॉलेज में हुई वित्तीय अनियमितता पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह,तत्कालीन मंत्री राजा पटेरिया सहित सुनील कपूर को बचाने में लगे है क्यों बचाया जा रहा है वह भी एक जाँच का विषय है।
वर्ष 2004 में की गयी शिकायत पर (ईओडब्ल्यू) द्वारा कार्यवाही न करना भी संदेह पैदा करता है। शिकायतकर्ता राधावल्लभ शारदा ने मामले को गंभीर मानते हुए 2015 में याने की 11 वर्ष बाद पुन: ईओडब्ल्यू में आवेदन किया परन्तु कार्यवाही न होते देख भोपाल न्यायलय में शरण ली।
भोपाल न्यायलय में प्रकरण लंबित है दिग्विजय सिंह सहित अन्य के बयान हो गये है। राजनैतिक गलियारे में राजनेता इसे राजनैतिक द्वेष वता रहे है तो कई  कोई हेराफेरी न होने की बात कर रहे है। पिछले दिनों सुनील कपूर अपने आप को निर्दोष साबित  करने के लिये हाईकोर्ट चले गये और हाईकोर्ट में शासन की और से मामला निपटाने  की नीयत से शासन के वकील ने कमजोर तरीके से पक्ष रखा जिससे निर्णय सुनील कपूर के पक्ष में चला गया। यहाँ यह प्रश्न उठता है की सरकार की और से वस्तुस्थिति क्यों नहीं कोर्ट के सामने रखी गयी यदि रखी जाती तो कपूर के पक्ष में फैसला नहीं हो पाता।
राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण व्यूरो की लचर कार्यवाही एवं राज्य सरकार के रवैये को देखकर प्रकरण की शिकायत शिकायतकर्ता द्वारा देश के प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी को की गई। म.प्र.का सरकारी तंत्र कितना गैरजिम्मेदार है इसका उदाहरण इस प्रकरण से लगाया जा सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रकरण को पर संज्ञान लेने के लिये प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र आता है। मुख्य सचिव कार्यालय में पदस्थ अधिकारियो के द्वारा प्रकरण को पुलिस विभाग को भेजा गया जबकि प्रकरण पर संज्ञान लेने के लिये राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण व्यूरो के महानिर्देशक को जाना था यहाँ पर भी यह संदेह खड़ा होता है। शिकायतकर्ता को टी.टी.नगर थाने से फ़ोन आने पर इसका रहस्य उजागर होता है कि मुख्य सचिव कार्यालय में पदस्थ कर्मचारी या अधिकारी कितने समझदार है या लापरवाह जो की प्रधानमंत्री कार्यालय की चिठ्ठी को भी गंभीरता से नहीं लेते। शिकायतकर्ता शारदा ने इसकी शिकायत वापस प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को की। मजेदार बात यह है मजेदार बात यह है कि प्रकरण पर संज्ञान लेने के लिये मध्यप्रदेश सरकार के दो  काबीना  मंत्रियो को प्रकरण की जानकारी मय दस्तावेज के दी गयी परन्तु मामला टॉय टॉय फिस्स ही हुआ। प्रधानमंत्री सचिवालय से लताड़ के बाद ईओडब्ल्यू सुप्रीम कोर्ट गया है प्राप्त जानकारी अनुसार सुनील कपूर को जबाब देने के लिये एक माह का समय दिया गया है मामले से सम्बंधित दस्तावेज का कूट परिक्षण करके एवं विभाग के अधिकारियो की टीप को माना जाय तो आर.के.डी.एफ. कॉलेज ने एक बार नहीं तीन बार यह वित्तीय अनिमियतितता की। नियम यह कहते है की प्रथम त्रुटि पर प्रति अनाधिकृत  प्रवेश पर रुपये एक लाख द्रितीय त्रुटि पर दो लाख तथा तृतीय त्रुटि पर कॉलेज की प्रवेश मान्यता निरस्त करने का प्रावधान है।
प्रकरण पर तत्कालीन मुख्य सचिव आदित्य विक्रम सिंह ने 23/11/2002 को नोटशीट में अंकित कराया कि इस संस्था द्वारा की गयी कार्यवाही को अनदेखा की जाना उचित नहीं होगा अन्यथा गलत सन्देश जायेगा अत: 24 लाख का जुर्माना लगाना चाहिये। परन्तु तत्कालीन मंत्री तकनीकी शिक्षा मंत्री राजा पटेरिया ने इसे अनदेखा कर इसे तकनीकी त्रुटि मानी और तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय को नस्ती भेजी जाती है तत्कालीन मुख्यमंत्री के पास नस्ती जाने के पूर्व मामला केवल आर.के.डी.एफ. का था परन्तु नस्ती में नया खेल हो गया जुर्माना 5 लाख का आर.के.डी.एफ. कॉलेज पर लगना था और साथ में जुड़ गयी नई संस्था सत्यसाई साई इंस्टीयट्यूट आफ साइंस एन्ड टेक्नालॉजी ,प्रश्न यह उठता है कि की सत्यसाई को क्यों जोड़ा गया उसकी त्रुटिया क्या थी जिसकी जांच किये बिना उसे इस नस्ती में जोड़ा गया। अत: ईओडब्ल्यू को सत्यसाई की भी जांच करना चाहिये परन्तु समरथ को दोष नहीं वाली कहावत चरिततार्थ हो रही है।
तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने राजा पटेरिया की अनुशंसा को स्वीकारते हुए अपने आदेश में दोनों संस्थाओ पर 5 लाख के जुर्माने पर अपनी सहमति दी (जुर्म करने वाले के साथ साथ देने वाला भी दोषी होता है )मुख्यमंत्री होने के नाते प्रकरण को पढऩा चाहिये परन्तु दिग्विजय सिंह ने प्रकरण को पढ़ा नहीं यदि पढ़ लेते तो सत्य साई के बारे में भी जानकारी लेते की सत्य साईं का मामला क्या है। परन्तु 5-2-2003 को मामला समाप्त कर दिया जाता है यदि देखा जाय तो मामले में कही खेल हुआ है।

शिकायत क्या थी
शिकायतकर्ता राधावल्लभ शारदा ने बताया कि उनके द्वारा की गई शिकायत में आर.के.डी.एफ.एजूकेशन सोसायटी जिसका कर्ताधर्ता डॉ. सुनील कपूर है। मप्र की राजधानी भोपाल, इंदौर और रीवा में इंजीनियरिंग कॉलेज, डेंटल कॉलेज, मैनेजमेंट कॉलेज, डायगनोस्टिक सेंटर और भोपाल में सत्य सांई नागरिक सहकारी बैंक चलाती है।
इस आर.के.डी.एफ. एजूकेशन सोसायटी जिसका रिकार्ड पता सैनिक फार्म फ्यूल सेंटर मण्डीदीप जिला रायसेन है, परन्तु संस्था 202, गंगा जमुना काम्पलेक्स बेसमेंट जोन-1, एम.पी.नगर से संचालित होती है। इस संस्था ने शासकीय अधिकारियों एवं लोक सेवकों से मिलीभगत कर जाली हस्ताक्षर से पत्र जारी किये है एवं शासकीय दस्तावेजों में हेराफेरी की हैं।

                            क्या बोलते है दस्तावेज 
समितियों के पंजीयक कार्यालय के रिकार्ड के अनुसार आर.के.डी.एफ. एजूकेशन सोसायटी का पंजीयन 13 अगस्त 1999 को हुआ है। इसके विपरीत आर.के.डी.एफ. इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी 1998-99 के दौरान ही छात्रों को प्रवेश दिया जा चुका था। बिना पंजीयन के गतिविधि प्रारंभ करना ही नियम विरुद्ध है।
वर्ष 1998-99 के दौरान संस्था ने 12 विद्यार्थियों को अनाधिकृत रूप से प्रवेश दिया। यह संस्था की पहली प्रवेश त्रुटि थी, जिसे समझौता शुल्क लेकर राज्य शासन द्वारा चेतावनी जारी की गई थी।
वर्ष 2000-01 में इस संस्था ने एक कदम आगे बढक़र 10 विद्यार्थियों को अनाधिकृत रूप से प्रवेश दिया और इन प्रवेशों को नियमित करने हेतु संयुक्त संचालक तकनीकी शिक्षा की ओर से एक फर्जी पत्र राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को लिखा।
वर्ष 2001-02 से संस्था द्वारा तीसरी बार गलती दुहराने पर संचालक तकनीक शिक्षा ने इस संस्था को ‘नो एडमिशन स्टेट्स’ पर रखने की अनुशंसा की। संचालक ने तत् समय ही पूर्व की गलतियों के लिये, संस्था से 4 लाख रुपये वसूलने का प्रस्ताव किया। इसमें 2001-2002 में दिये गये अनाधिकृत प्रवेश की राशि सम्मिलित नहीं है।
तत्कालीन उप सचिव तकनीक शिक्षा ने सचिव तकनीकी शिक्षा के माध्यम से वसूली की अनुशंसा सहित यह प्रकरण तत्कालीन मंत्री जनशक्ति नियोजन श्री राजा पटेरिया को भेजा। श्री पटेरिया ने प्रवेश की गंभीर त्रुटि को सामान्य मानकर प्रकरण को समाप्त करने की अनुशंसा कर दी।
मंत्री श्री पटेरिया के आदेश पर जब संचालनालय ने स्पष्ट निर्देश समझौता राशि बावत् चाहे तो मामले को सघन जांच हुई। तत्कालीन सचिव जनशक्ति नियोजन श्री आर.परशुराम द्वारा पुन: नस्ती तत्कालीन मंत्री श्री राजा पटेरिया को भेजी गई जो उन्होंने अपने निर्णय की अंतिम पंक्ति में जो आदेश 11.11.02 को लिखा उसे लोक सेवकों की मदद से शासकीय अधिकारियों की मिलीभगत से बदल दिया गया और उसे बदल कर 5 लाख रुपये दंड और भविष्य के लिये चेतावनी की अनुशंसा कर दी गई।
नस्ती तत्कालीन मुख्य सचिव श्री आदित्य सिंह के माध्यम से तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पास पहुंची। श्री दिग्विजय सिंह के पास नस्ती भेजने के पूर्व तत्कालीन मुख्य सचिव ने अतिरिक्त संचालक के जाली हस्ताक्षर का मामला अंकित किया और 24 लाख रुपये की जुर्माने की राशि को उचित बताया।
तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय ने प्रकरण में मंत्री श्री राजा पटेरिया के मत से सहमत होते हुये 5 लाख जुर्माना और चेतावनी की सजा देना उचित समझा।
इस कारण प्रकरण में अतिरिक्त संचालक तकनीकी शिक्षा के जाली हस्ताक्षर का मामला संचालक से लेकर मुख्य सचिव, मंत्री व मुख्यमंत्री तक के संज्ञान में आया परन्तु किसी ने कोई कार्यवाही प्रस्तावित नहीं की।
24 लाख रुपये के जुर्माने को 5 लाख में बिना किसी औचित्य के बदला गया जिससे शासकीय कोष को हानि पहुंची। जबकि इसी प्रकार के अन्य मामलों में राशि पूरी वसूली गई है। शासकीय अभिलेख में स्पष्ट दिखती छेड़छाड़ पर किसी के द्वारा भी संज्ञान नहीं लिया गया। मामला आर्थिक अपराध से संबंधित है जो कि काफी गंभीर है।